Thursday, May 19, 2011

गुल से गुलशन महक उठे हर रात ठहर जाए ,
मन बावला मचल उठे जज्बात पे अड़ जाए ;
मरुभूमि के तपते तन पर ओंस जो पड़ जाए ,
गर्मी के मौसम में यूँ बरसात जो पड़ जाए ।

3 comments:

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

sunder...

Dr Varsha Singh said...

बहुत ही कोमल भावनाओं में रची-बसी खूबसूरत रचना के लिए आपको हार्दिक बधाई।
चार पंक्तियों में पूरी दुनिया समेट दी है आपने तो....

JHAROKHA said...

pradeep ji
in char panktiyon me to aapne jivan me khushi ka saar hi bhai diya hai
kya baat hai ?
gagar me sagar
bahut bahut badhai
poonam