Monday, December 17, 2012

देखो बु आ रही है ये दुनिया जलने की,

आज राह देखता सूरज शाम ढलने की,
जिंदगी हर एक की यहाँ पशोपेश में "दीप",
एक चुनौती है वक़्त के साथ चलने की |

2 comments:

Virendra Kumar Sharma said...

देखो "बू " आ रही यह दुनिया जलने की ....

बढ़िया टुकडा है शैर का ,माहौली भाव कनिका है मौसिम (मौसम ) के एहसास की .शुक्रिया चर्चा मंच अनुस्थापन के लिए .

Ashok Khachar said...

बहुत बहुत सुन्दर.